मेरे मित्र आशीष से पहली पंक्ति उधर लेते हुए चार पंक्तियाँ लिख रहा हूँ ....
यूँ नींद से वो जान-ए-चमन जाग उठी है
इसी क़यामत का था कब से इंतज़ार मुझको
वो जन्नतें और होंगी मिटते हैं जिसके लिए काफ़िर
इस चमन के कांटे भी मंजूर बार बार मुझको
कवि स्पर्श
Saturday, January 30, 2010
Friday, January 1, 2010
नए वर्ष का मंगल स्वागत
पल पल कर के आखिर फिर से, साल पुराना गुजर गया
एक बार फिर सुबह हुई तो नया नया उत्साह भर गया
नया नया सा क्या है इसमे, क्यों अज्ञात ख़ुशी है मन में
यहीं सोंच कर खोया हूँ मैं, झांक रहा हूँ मन दर्पण में
नए साल का पहला दिन भी, बीत चला है न जाने कब
नए वर्ष की नयी रोशनी, चलो नया आरम्भ करें सब
एक बार फिर सुबह हुई तो नया नया उत्साह भर गया
नया नया सा क्या है इसमे, क्यों अज्ञात ख़ुशी है मन में
यहीं सोंच कर खोया हूँ मैं, झांक रहा हूँ मन दर्पण में
नए साल का पहला दिन भी, बीत चला है न जाने कब
नए वर्ष की नयी रोशनी, चलो नया आरम्भ करें सब
Friday, May 29, 2009
मै मानसी, एक अनंत असाधारण कल्पना
अरविन्द पाण्डेय जी की परा वाणी पर कविता पढ़ी। बड़ी अच्छी शैली है। नारी पर उनकी कविता "मै नारी हूँ, नर को मैंने ही जन्म दिया " ने मुझे प्रेरित किया की मैं इस विषय पर अपनी ४ पंक्तियाँ जोड़ दूँ। प्रस्तुत है वो ४ पंक्तियाँ..., अरविन्द जीको आभार सहित धन्यवाद...
मै मानसी, मै हूँ एक अनंत असाधारण कल्पना
सृजन और प्रलय से परे उस शक्ति की रचना
जिसकी अभिलाषा को मैंने ही आकार दिया
और सृष्टि के अंत तक,
उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना को अपना गर्भ देना स्वीकार किया
और स्वीकार किया अपनी शक्ति को निर्बल स्वरुप में रखना
और पुरुष के अंहकार विष को अपने ममता के कंठ में उतारते रहना
ताकि उस सृष्टा की अभिलाषा कलुषित न हो, दूषित न हो
युग युगांतर तक उसकी कल्पना फले फूले, खंडित न हो
और स्वीकार किया कामनी का रूप धर
माया के प्रबल चक्रवात को समेटे रखना
और जब पुरुष की विवशता कभी आंसू बन छलके
तो उसके स्वाभिमान को पुनर्जीवित करना
जिसके लिए सर्वस्व समर्पित, वही मेरे अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न
ये कैसी विडम्बना
पर मै तो अमिट, चिर संजीवनी, चिर जीवषी
मै हूँ मानसी, मै हूँ एक अनंत असाधारण कल्पना
मै मानसी, मै हूँ एक अनंत असाधारण कल्पना
सृजन और प्रलय से परे उस शक्ति की रचना
जिसकी अभिलाषा को मैंने ही आकार दिया
और सृष्टि के अंत तक,
उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना को अपना गर्भ देना स्वीकार किया
और स्वीकार किया अपनी शक्ति को निर्बल स्वरुप में रखना
और पुरुष के अंहकार विष को अपने ममता के कंठ में उतारते रहना
ताकि उस सृष्टा की अभिलाषा कलुषित न हो, दूषित न हो
युग युगांतर तक उसकी कल्पना फले फूले, खंडित न हो
और स्वीकार किया कामनी का रूप धर
माया के प्रबल चक्रवात को समेटे रखना
और जब पुरुष की विवशता कभी आंसू बन छलके
तो उसके स्वाभिमान को पुनर्जीवित करना
जिसके लिए सर्वस्व समर्पित, वही मेरे अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न
ये कैसी विडम्बना
पर मै तो अमिट, चिर संजीवनी, चिर जीवषी
मै हूँ मानसी, मै हूँ एक अनंत असाधारण कल्पना
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